पता नहीं अंत किसका होगा
बसंत का या नीड़ का
परन्तु मैं बेघर हो जाऊँगा
पता नहीं नया क्या होगा
दृश्य या आँखें
परन्तु सब कुछ नया लगेगा
पता नहीं मैं क्या छोड़ जाऊँगा
अपना कुछ या अपनापन
परन्तु कमी महसूस होगी
पता नहीं मैं क्या ले जाऊँगा
कल की यादें या कल की तैयारियाँ
परन्तु भार दोनों का मेरे काँधों पर होगा
पता नहीं क्या अधिक भारी है
ये बोझ या मन
परन्तु असर दोनों का एक सा है
कुछ पता नहीं
इतना मालूम है बस
एक रास्ता
जो हमेशा वापस मुड़ता था
अब सीधा
अपार
अजान
अंतहीन
नज़र आता है

– Aninda K. Chakraborty (1989)


This poem was penned by Aninda Chakraborty (OGBS School Captain) on March 25, 1989, his penultimate day as a student in Oak Grove. It was shared by him on email upon request.

0 Comments

Leave a reply

Oakgrovians Young & Old @ 2020

or

Log in with your credentials

or    

Forgot your details?

or

Create Account