घर ओर चला, घर छोड़ चला
आया उस घर से जब इस घर
कई टूटे तारों को जोड़ चला!
कुछ मुस्काया, कुछ आँख हुई नम
फ़िर बेधड़क यार से लिपट गया
सीने की धड़कन बोल उठी
दुनियादारी सारी तोड़ चला।
लोग वही, किस्से भी वही
बचपन फ़िर से महसूस हुआ
जब जाम उठे, दिल और खुले
ठहाकों का दौर ताबड़तोड़ चला।
शाम ढली फ़िर रात हुई
रात सुबह की ओर चली
रोया हँस हँस, हँस हँस रोया
यादों का कारवां दौड़ चला।
इक फ़ोन किया उस घर को भी
बेटी को सुना, पत्नी से कहा
तुम सो जाओ, मैं जगूँ अभी
रंग यारी का इधर बेजोड़ चला।
कुछ हाल पूछ, कुछ चाल पूछ
दुनिया के सब जंजाल पूछ
फ़िर पूछा, क्या “उसकी” ख़बर कोई
इश्क़ पुराना नसें मरोड़ चला।
दो दिन ही थे जो बीत गए
चलने का लम्हा पास खड़ा
नाश्ते की मेज़ का सन्नाटा
ट्रेन, प्लेन कोई, कोई बाई रोड़ चला।
चित्रों में यादों का भँवर लिए
घर ओर चला, घर छोड़ चला।

-सुदीप बाजपेई (1996 Batch)


This content has been reproduced from a Facebook post by Sudip Bajpai on November 01, 2017.

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