दस बरस तेरी छाती से मैं चिपका रहा
पंख तो तूने दिऐ पर उड़ने को न मेरा दिल कहा।
सुबह की धुंध, निरंतर बारिश, इंद्रधनुष की शाम
मित्रों का संग, अलसाई चाल, जल्दी का न कुछ काम!

तेरी सर्द हवाओं और चमकती धूप ने
मेरा चेहरा ही नहीं, चरित्र भी तराशा है।
ये ऊँची लहरें, ये रोड़े, ये अडंगे
मैं क्या जानू कि क्या चीज़ हताशा है!

छिले घुटने, रगड़ खाई कोहनी
इनका न मुझे कुछ गिला है।
और क्या मैं कहूँ कमबख़्त
मेरा ख़ून तेरी बजरी में घुला है!

हृदय के पुजारी का इस बरस भी तीरथ का इरादा है
मेरे चारों धाम तू, चारों धाम से तू ज़्यादा है।
आँचल तेरा, मुस्कान मेरी, तू माँ, तू दादी, तू नानी है
तिलिसमी तेरी मिट्टी की खुशबू, तेरा नाम झरीपानी है!

-सुदीप बाजपेई (1996 Batch)


This content has been reproduced from a Facebook post by Sudip Bajpai on March 10, 2017.

0 Comments

Leave a reply

Oakgrovians Young & Old @ 2020

or

Log in with your credentials

or    

Forgot your details?

or

Create Account