पूछा जो किसी ने, क्या आप पहाड़ों से लौटे हैं?
कहा मैंने,

हर वर्ष शरीर अपना लिए, इसे आत्मा से मिलाने जाता हूँ
समझ इसे मेरा तीरथ, अपना इश्वर वहीँ पर पाता हूँ!

मिल वृक्षों से, मिल पत्तों से, चेहरा मेरा खिल जाता है
जब छुए मुझे वायु शीतल, मुझे स्वर्ग मिल जाता है!

जो मित्र बना, वो मित्र रहा, होठों से हंसी ना जाती है
छोड़ छाड़ अपना ये ढोंग, ऑंखें फिर से भर आती हैं!

आप रहे न उधर कभी, आप भला क्या समझेंगे
बचपन बीता जिनका वहाँ, वो लोग भला क्या लौटेंगे!

मैं मूरख, मैं अज्ञानी, अभी आयु में छोटा हूँ
संकेत समझिये पर श्रीमान, पहाड़ों से नहीं, पहाड़ों पे लौटा हूँ!

-सुदीप बाजपेई


This content has been reproduced from a post created by Sudip Bajpai (1996 Batch) on November 05, 2014.

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