दुनिया एक आईना थी
हंसो तो वापिस हंसती थी
हमसे पूछो हमारे जंगले मे
लंगूरों की क्या मस्ती थी

दोस्त के कंधे पे कोहनी टिका कर,
उसी से छीना हुआ “ठेकुया” आधा खा कर,
दौड़ते हुए रुक जाना,
“ले साले, तू भी खा ले,
कह कर एहसान जताना ….

मेरा greeting card मुझ तक पहुचने के पहले ही खुल चुका था,
कोई कमीना मेरी GF से मुझसे ज्यादा घुल चुका था,
बोला तेरा एक कार्ड तो तेरे शहर से आता है ,
तेरी across valley वाली को हम reply कर दें तो तेरा क्या जाता है?

प्यार किसी को हुआ,
चिट्टी किसी और ने edit की ,
पहुचाई तीसरे ने,
team work इसे ही कहते हैं,
ये अलग बात है के लड़की ज़्यादा खुश हो गई,
उसे लगा तीनों ह़ी मुझ पर मरते हैं

कोई बेहतरीन stage pe, कोई अव्वल athlete था,
पर class मे इज्ज़त किसी की नहीं थी
स्कूल का सुपरस्टार, अपनी क्लास में joker ही होता था
गालियाँ सबको बराबर ही मिलती थी,
अक्सर school captain क्लास मोनिटर नहीं होता था

आज भी बजती है फ़ोन की घंटी जब तो सोचता हूँ,
एक आवाज़ आयेगी उधर से – “ कमीने बोल कब मिला जाए”?
वो पेड़, वो सड़क , वो पुश्ता , फिर वो ठंडी धुप मे लेटा जाए
चल आज फिर लंगूरों को उचलते कूदते देखा जाए

– Kanishka Mallick, Sudip Bajpai (1996 Batch)


This poem is a work by Kanishka Mallick and Sudip Bajpai. This content has been reproduced from a Facebook post by Ritu Khare Bajpai on November 25, 2011.

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