ऐ वक़्त आज उसी पुश्तै पे चल बैठा जाए,
फिर लंगूरों को उचलते कूदते देखा जाए …
जहाँ दोस्तों के साथ चिल्लाया-चीखा हमने,
दोस्ती किसे कहते हैं जिनसे सीखा हमने,
चल फिर ज़िन्दगी का revision किया जाए….

जिस classroom का First आने वाला ही ,
फ़ैल होते हुए को खुद पास कराता है ,
जहाँ , घर से चिट्टी आई सुना लेकिन ,
दोस्त उधास है यह देख कर ,
अपनी चिट्टी पढना भूल जाता है …

दोस्त race जीता तो उसका medal पहेन कर ,
उसकी हर जीत अपनी लगती थी ,
और वो हार गया तो अपनी हार के बाद ,
भूख भी नहीं लगती थी….

“तेरे पास extra white trouser होगी क्या?”
“नहीं पर arrange करता हूँ….
“तू अपनी practice पे निकल ….
“मैं कुछ jugaad करता हूँ….”
जब वापिस लौटा spikes से घांस निकालते हुए तो 6 बजाती घड़ी थी,
वो कमीना कहीं नज़र नहीं आया,
पर एक white trouser bed पे पड़ी थी….

शाम को अचानक बटवारा हो जाता था ,
3:45 pm का दोस्त, opposition ka goalkeeper हो जाता था,
खिलाड़ी की तरह मैदान मे उतरता था हर कोई ,
जीत किसी की भी हो ,
अगर 100% दिया तो गले मिलता था आ कर goalkeeper वो ही….

रात को दोस्त थक हार कर सो जाता है
चन्द्रमा में माँ का चेहरा उभर आता है
आज तक आभारी हूँ और हमेशा रहूँगा
papa mummy की वजह से मेरा हर दिन
इतना कुछ सीखने मे निकल जाता है
न भेजते वो मुझे इन् पहाड़ों पर तो मेरा क्या होता,
वो लाल पेढे का डब्बा record time में क्या ख़ाक खाली होता

आज भी बजती है फ़ोन की घंटी जब तो सोचता हूँ,
एक आवाज़ आयेगी उधर से – “ कमीने बोल कब मिला जाए”?
वो पेड़, वो सड़क , वो पुश्ता , फिर वो ठंडी धुप मे लेटा जाए
चल आज फिर लंगूरों को उचलते कूदते देखा जाए

– Kanishka Mallick, Sudip Bajpai (1996 Batch)


This poem is a work by Kanishka Mallick and Sudip Bajpai. This content has been reproduced from a Facebook post by Ritu Khare Bajpai on November 25, 2011.

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