Khalil, Sudip & Kanishka

(our dearest friend, teacher and life long mentor)

पहले दिन taxi के पीछे वो दौड़ा था
Trunk और hold-all पीठ पे ले कर, dormitory तक छोड़ा था

वही लड़का अगले दिन dining hall में खाना खिला रहा था
इक और नया बच्चा आया उसके गाँव , वो उसे अपना रहा था

भौचक्के हो के दौड़ते रहे उसके पीछे 20 बच्चे, वो हमें दौड़ा रहा था
“Udi Baba, Udi Baba ” चिल्ला रहे थे हम, वो हमें hockey सिखा रहा था

कद बढ़ गया कुछ बच्चों का, कुछ उससे तेज़ भी हो गए
जिस दिन हारा अपने बच्चों से proudly बोला, “लौंडे बड़े हो गए”

जिस शाम कोई मुसीबत आई किसी बच्चे पे, सबसे आगे उसका सीना था
उसके जैसों ने ही हमे सिखाया आगे ज़िन्दगी मे कैसे जीना था

सालों बाद जब मिले उससे, कुछ देर सन्नाटा हो गया
मिलने की ख़ुशी थी मगर, सबको इक दर्द चुभो गया
गले मिले, मुस्कुराए; एक खुल के रोया, दुसरे की आँख नम हो गयी
पर ज़िन्दगी की मुसीबतें, उन लम्हों में कुछ देर के लिए कम हो गयी

Taxi की खिड़की से उसका मुस्कुराता चेहरा
Hockey stick पकड़ना, उसके पीछे भागना
आज हारे तो क्या हुआ, कल के जीत की सोच मे सारी रात जागना
गरम मठरी के टुकड़े खाते हुए सब याद आ गया
Udi Baba, उसका गाँव…. थोड़ा हंसा गया…. थोड़ा रुला गया

– Kanishka Mallick, Sudip Bajpai (1996 Batch)


This poem is a work by Kanishka Mallick and Sudip Bajpai. This content has been reproduced from a Facebook post by Ritu Khare Bajpai on November 25, 2011.

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