दूर दीवार पर इठला कर बैठी वो गिलहरी..
और हमारी बीती शैतानियाँ..
आसमान में चमकता वो अकेला आदित्य..
और हमारे दिलों में बसी चिंगारियाँ..
हरी-हरी वो मखमली क्यारियाँ..
और दोस्ती में दी कुर्बानियाँ..
रास्तों में पड़े वो मुरझाए पत्ते..
और दोस्तों संग की किलकारियाँ..
ये पेड़, ये पौधें, ये घास..
और मस्ती की वो ढेरों कहानियाँ..
झरने का वो ठंडा-ठंडा पानी..
और उसके नीचे की हमारी धमा-चौकड़ियाँ..
बादलों की वो शोर मचाती बारात..
दूर तक फैली वो सुनहरी वादियाँ..
और उससे भी गहरी हमारी यारियाँ..

दिलों में लेकर चलते हैं हम..
उन यादों का सागर..
संचित कर हर लम्हे को..
अब वक्त हुआ है लौटने को अपने घर को..
छोड़ कर पीछे, इस ‘ओक भवन’ को…

– संचित चंद ठाकुर (2013)


This poem was shared by Sanchit Chand Thakur on  June 01, 2019 over a direct message on Instagram. This is Sanchit’s first post on Oakgrovians Young & Old.

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