कुछ गालियाँ और गालियों से बुरी होती हैं.
कुछ और भी खराब लगती हैं जब,
वो कोई ऐसा शख़्स देता है जिसे,
या तो आप बिलकुल नहीं जानते;
या फ़िर उससे जिसे आप जानना ही नहीं चाहते.
मगर सबसे बुरी ये गालियाँ उनसे लगती हैं,
जिनको आप समझने की कोशिश कर रहे हैं,
पर वो आपको बहुत अच्छी तरह पहचानते हैं.
वो लड़का, जो अपने जूते के फीते बांधने से पहले
आपको कहता है “फीते बाँध ले, मुँह के बल गिरेगा”.
और जिस शाम आप गिरने वाले होते हो,
ये लड़का अचानक कहीं से आता है, आपको संभालता है
और वो ही लम्बी गाली दे के कहता है, “तू सुधरेगा नहीं”.
ये वो इंसान है, जो आपके साथ नंगा नहाया है,
एक ही साबुन, एक ही मग और एक ही पानी की धार से.
दो दोस्त जो जब देखो एक दूसरे से लड़ते ही मिलेंगे,
उनको मज़ा आता था छेड़ने में,
दूसरे को परेशानी में देख के.
पर सिर्फ तब,
जब ये दर्द उन्होंने खुद दूसरे को दिया हो,
मजाल है के कोई और इस शरारात की जुर्रत करे,
दोनों यूँ एक तरफ आ के उस तीसरे को बर्बाद करते हैं,
जैसे, दो भाइयों को एक ही लड़की से प्यार हो जाए.
कुछ यार, जिन्हें लगता था
दुनिया इतनी सी ही है,
एक मैदान से दूसरे मैदान की दौड़,
एक ही शहर में रह के,
एक दूसरे को चिट्टी लिखना.
ज़िन्दगी ये ही है,
बिन बोले बातें समझ लेते हैं सब ही लोग.
अपने फीतों की फ़िक्र करने की कोई ज़रुरत नहीं,
क्योंकि कोई है जो पीछे खड़ा है.
वो बच्चे, जो लम्बे हो गए पर बड़े नहीं हुए
आज भी अगर मिलेंगे तो सबसे पहले,
दुनिया की सबसे बुरी गाली देते हुए,
दुनिया का सबसे लम्बा गले लगेंगे;
और कहेंगे, “तू नहीं बदला”.
पर वक़्त बदल गया है,
अब मुलाक़ातें कम होतीं हैं,
और इसलिए ये गालियाँ और भी बुरी लगती हैं,
क्योंकि अब ये गालियाँ कोई देता ही नहीं.
और किसी अजनबी से सुनने को मिल भी जाए,
तो महसूस नहीं होती,
कुछ गालियाँ और गालियों से बुरी होती हैं.

– कनिष्क मल्लिक (1996)


This poem was shared by Kanishka Mallick on  Oct 30, 2018 over a message on phone.

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